Archive for October 5th, 2012

October 5, 2012

ऐ मेरी कविता
तू मेरे लिए क्या है
मन बहलाने का साधन
समय काटने का ईधन
या बकचोदी का इंजन
जब दुनिया से थक जाता हूँ
हो जाता हूँ कुछ बोर
जब सब कुछ पाकर भी कुछ नहीं प्राप्य कर पाता हूँ
जब सोच कर मैं कुछ डर जाता हूँ
जब लोगों से मिलकर पक जाता हूँ
सर में हो जाता है दर्द
सब कुछ गलत है लगने लगता
घुमड़ने है लगता कुछ कुछ अंदर
जब कोई चुप चाप से ये है कहने लगता
चल करते हैं बंधू फिर से कविता
जब मैं खुद को कहता हूँ नहीं नहीं
मेरे पास अभी कहने को कुछ है ही नहीं
जब मैं यहाँ वहां खुद को व्यस्त कर जाता हूँ
जब चाह कर भी मैं रातों को सो न पाता हूँ
जब मन में लाकर भी बात कोई
जिसको गरियाना था उसको सुना न पाता हूँ
जब लगता है कोई होता, कोई होता साथ कोई
जब लगता है नहीं हो रही कोई भी नयी अब बात कोई
जब लगने लगती है ये दुनिया सूनी सूनी सी
जब आँखें बंद कर लेने पर भी नींद नहीं दिख पाती है
जब सुबह तक जगे रह जाने की बात सोच
मेरी पतली हालत और भी महीन हो जाती है
जब कम्पयूटर की ओर जाते हुए मेरी उंगली कपकपाती है
जब कई बार खोल कर लैपटॉप कविता अटक जाती है
जब हम खुद स पूछते हैं की
क्या कविता करना जरुरी है?
क्या होती है कविता? क्या स्टर होगा?
हम खुद को कारन पिछले याद दिलाते हैं
की हम तो तब ही लिखते हैं जब खुद को रोक न पाते हैं
चलो आज करो अपवाद कोई, चलो यूँ ही लिख लेते हैं
जो पहले लिखीं उन्हें किसने है पढ़ा? एक और यूँ ही कह लेते हैं
हम कवी नहीं है, हमारे अंदर कविता है
हम तो बस जो रहता है उसे कह लेते हैं
सब बातों का सार यही की
या हम लिखते हैं या जग लेते हैं

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ऐ मेरी कविता
तू मेरे लिए क्या है
मन बहलाने का साधन
समय काटने का ईधन
या बकचोदी का इंजन
जब दुनिया से मैं थक जाता हूँ
हो जाता हूँ खुद से बोर
जब सब कुछ पाकर भी लगता है
ऐ काश की पा जाता मैं कुछ और
जब लाख कोशिशें कर के भी
कुछ प्राप्य नहीं कर पाता हूँ
जब सोच कर किसी अनहोनी का
मैं मन ही मन में कुछ डर जाता हूँ
जब मिलता रहता हूँ लोगों से
और मिल मिल कर उनसे पक जाता हूँ
जब ऑटो वाले से झों झों कर
सर में दर्द हो जाता है
जब चीज़ों के थोड़ा सा बिखरते ही
‘सब हो जायेगा गलत’ लगने है लगता
जब छोटी छोटी सी बातों पर
कुछ घुमड़ने अंदर से है लगता
जब घर जाने का मन न हो
और लगने लगता है लम्बा बहुत ही रस्ता
जब दिल्ली की मेट्रो में खड़े खड़े
पतली टाँगे दुःख जाती है
जब घर वापस जाने वाली आखिरी मेट्रो
देर बहुत लगाती है
जब कोई कन्या कहती है, ‘चलो मिलते हैं’
पर शाम को फ़ोन नहीं वो उठाती है
या उठा कर कहती है अभी करती हूँ
फिर गायब हो जाती है
जब खाना खाते वक़्त हम सोचा करते हैं
उसका फ़ोन अभी आता होगा, वो क्या करती होगी
तभी घंटी बजती है और पुराना घिसा दोस्त दारू पीने के लिए बुलाता है
जब दारू के पैग के ऊपर वो लम्बी कहानी सुनाता है
जब मन सब और से है चटने लगता
जब कुछ भी नहीं है ढंग का लगता
जब प्याज पड़ा गरम उबला अंडा
जबां पर लग, है ठंडा लगने लगता
जब टी वी पर सब पार्टी वाले चिल्ला चिल्ला कर बातें करते हैं
जब लगता है आने वाला पल आएगा फिर नहीं जायेगा
जब लगता है जब जग से सब चाहने वाले चले जायेंगे
तो कौन संग रह जायेगा
जब मैं यहाँ वहां खुद को व्यस्त नहीं कर पाता हूँ
जब चाह कर भी मैं रातों को सो न पाता हूँ
जब मन में लाकर भी बात कोई
जिसको गरियाना था उसको सुना न पाता हूँ
जब लगता है कोई होता, कोई होता साथ कोई
जब लगता है नहीं हो रही कोई भी नयी अब बात कोई
जब लगने लगती है ये दुनिया सूनी सूनी सी
जब आँखें बंद कर लेने पर भी नींद नहीं दिख पाती है
जब सुबह तक जगे रह जाने की बात सोच
मेरी पतली हालत और भी महीन हो जाती है
जब यूँ ही जबरन हाथों से कम्पयूटर की इस्क्रीन खुल जाती है
लेकिन उसके की बोर्ड पर जाते जाते कविता लटक जाती है
तब हम खुद से पूछते हैं की
क्या कविता करना जरुरी है?
क्या लिखने को है कुछ पास तेरे
क्या खालिस हैं ये जज़्बात तेरे
जब हम खुद को जो कल सोचा था
वो सब शब्द याद दिलाते हैं
अनायास उभर आये मन चित्रों को
कविता में अर्पित करने की बात दोहराते हैं
जब हम यूँ ही अपने मन को
भटकते हैं, उलझाते हैं
जब हम खुद पे खाली मुली की शंका पैदा करते हैं
जब हम खुद पे कविता के अनर्गल स्टेंडर्ड थोपा करते हैं
की हम तो तब ही लिखते हैं जब खुद को रोक न पाते हैं
की हम तो हर कविता से अपना स्तर बढ़ाते हैं
तब धीरे से कोई कहता है, बंधू करो आज कोई अपवाद कोई
कह डालो जो भी कहना है, अच्छा या बकवास कोई
गुरु क्या तुमको लगता है तुम हो सुपर स्टार कोई
कविता है नहीं अमृत मंथन है, कर दोगे देवों का उद्धार कोई
बस कुछ शब्दों का इक ढेर है ये, पाखंडों का एक अम्बार है ये
कृष्ण की भूली बंसी है, वीणा का टूटा तार है ये
हम बेगैरत बेदर्दों जग में केवल उद्धार है ये
हम कवी हैं केवल उतनी देर जितनी देर हम कविता कहते रहते हैं
कहते हैं खुद को कवी जो वो कविता नहीं ढकोसला किया करते हैं
अरे बस अंदर कविता होने से कोई कवी नहीं बन जाता है
करने होते हैं त्याग कोई, तब कवी ह्रदय वो कहलाता है
जो पहले लिखीं उन्हें किसने है पढ़ा? चलो एक और यूँ ही कह लेते हैं

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