Archive for September 25th, 2012

September 25, 2012

क्या फर्क पड़ता है की मैं क्या चाहता था
क्या होना चाहता था, क्या बनना चाहता था
कितना हंसना चाहता था कितना रोना चाहता था
रगड़ बदन को आसमान के बादलों में
मैं धरती की चिपटी उबटन को खुरचना चाहता था
रंग नीली चदरिया अपनी मैं, उस घनघोर उमड़ती बारिश में
धरती पे बीते दिनों के पक्के रंग
जो अब तक जी में यूँ चिपटे थे
जैसे उनपर मेरा कोई ऋण हो
वो ऋण बिना चुकाए में उन रंगों को धोना चाहता था
मैं खुद को उन सतरंगी इन्द्रधनुषों में खोना चाहता था
पर बादल में भी हाय क्या कहूँ कुछ रखवाले रहते हैं
हमको उनका पता न था हम तो खुद को मतवाले कहते थे
पकड़ टांग से हमें घसीटा, दे धक्का धरती पे फेंका
पीछे फेंका जो भी था हमने लपेटा
एक चददर, कुछ श्रिंगार का सामान और एक वो कमंडल सा लोटा
पड़े रहे कुछ देर युहीं, खुद से यूँ ही कहते रहे
कुछ देर रहो तुम सधे हुए, खुद को अपने बस में किये हुए
ये हार नहीं शुरुआत है ये,
यह अंत नहीं इम्तिहान है ये
कल फिर से सवेरा आएगा
हाँ उड़न खटोला आएगा
बस तब तक तू थोडा चलता रह
धरती वालों से मिलता रह
कभी कभी धरती वालों से हमने बताया कौन थे हम
मैं चिल्ला चिल्ला कर कहता था
जाने फिर भी क्यूँ यूँ मौन थे वो
कभी कभी जब आसमान वाले
आते थे नीचे पिकनिक पे
मैं भी छुप छुप कर जाता था
खड़ा होकर दरवाज़े पे
जैसे मुझे कुछ मालूम न हो
मन ही मन उनसे
अन्दर बुलाने की गुहार लागता था
वो मुझको देखा करते थे
मंद मंद हंसा वो करते थे
जाने कैसी थी एक अबूझ पहेली
वो भी मुझसे कुछ न कहते थे
कुछ देर युहीं दरवाज़े पे
मुझसे बातें करते थे
समझ नहीं आता था मुझको
समझ मेरे हालातों को
सुन कर मेरी गहरी बातों को
पहचान मेरे आघातों को
क्या बरबस वो विह्वल हो जाते थे
सांत्वना भाव से भर जाते थे
या फिर जैसे किसी मदारी के
डमरू बजने पे बन्दर की उछल कूद
देख कर कर हम अपना दिल बहलाते हैं
यूँ उछाल के कुछ पुराने नाकाम से सिक्के
हम अपने घर को रुखसत हो जाते हैं
कुछ वैसा ही वो मेरे भी संग दुहराते थे
इन दो छंदों में बंटा हुआ
चक्की और मुसल में पिसा हुआ
मैं कुमसा, सिमटा सा रह जाता था
कुछ कहने की कोशिश करता था लेकिन
शब्द नहीं पा पाता था
चल देता था मैं यूँ ही किधर
कुछ देर जिधर को हवा अच्छी लगे
कुछ देर जहाँ पे ठंडी हो
कुछ देर जहाँ शाम ठहरी हो
ऐसा कोई पीपल वाला पेड़ तलाशता था
छूता था किसी बरगद को मैं
कुछ देर चिपट उससे खड़ा रह जाता था
तकता था फिर दूर तलक
सब खाली खाली पाता था
सोचता था यहीं सो जाऊं
क्यूँ न इस बरगद का ही हो जाऊं
लेट कुछ देर उसकी ओर देखता था
उसकी डालों के बीच उसे ढूंढता था
फिर जैसे कोई पर्दा उठता था
बरगद सिर्फ पत्तियों का झुण्ड सा लगता था
और उठ चल देता था मैं अपने ठिकाने को
जहाँ रखा था कमंडल उस कोने को
जहाँ नहीं था कुछ भी खोने को
जहाँ इंतज़ार नहीं था कुछ भी होने को
और चलते चलते कुछ कहता था
खुद से में यूँ ही कहता रहता था
आसमां वाली मजलिस को दूर से देखा करता था
उनकी बारिश को तरसा करता था
कनखियों से ताकता था धरती के बंद घरोंदो को
बंद उनमें बारिश की छोटी छोटी बूंदों को
घर के द्वार पे आकर खड़ा हुआ
जैसे घर पहुंचा ठगा हुआ
कैसे जाऊं इसके अंदर
कैसे बन जाऊं जग का बन्दर
कैसे खुद से कहूँ ये आंसूं नहीं ये मोती हैं
कैसे कहूँ जग में ऐसा ही होता है
की कुछ रीत ही जगत की ऐसी है
कुछ बारूद जमा हो जाता था
आँखों में गुस्सा भर जाता था
सीने में लहू उमड़ने लगता था
बदन सिहरने लगता था
कहने लगता था पुरजोर कोई
मैं आऊंगा मैं आऊंगा
धरती अम्बर सब मेरे होंगे
मैं सबको उनकी जात दिखाऊंगा
फिर लेकर के गहरी श्वास कई
मैं सच ये जान ही लेता था
जिसे धीरे से बुदबुदा के खुद से कहता था
कोई फर्क नहीं पड़ता सबको दिखलाने से
कुछ रखा नहीं जग जीत जाने में
मिटटी से मिटटी टकराने में
बस इतनी थोड़ी सी है बात
सब रखा है बस ये जान जाने में
फर्क पड़ता है तो सिर्फ ये जान लेने से
की अब कोई फर्क नहीं पड़ता की मैं क्या चाहता था
कोई फर्क नहीं पड़ता तेरे मिट जाने से
इतना खुद से कह जाते ही
बस ये बात खुद को समझाते ही
कई दीप से जल उठते थे
हर ओर उमड़ वो पड़ते थे
हर घर धरती का जो बंद ही था
उसके खिड़की दरवाज़े खुद खुल पड़ते थे
कुछ लोग खड़े थे आंसू लिए
कुछ दरवाज़े से तकते थे
मैं ठगा हुआ निस्तब्ध खड़ा था
और वो मेरे ही घर को चलते थे
लाये वो अपने घरों से अम्बार
मेरे घर को भर डाला था उनसे
कल की बता दी दिनचर्या मुझको
समझाया क्या क्या करना है
जाने कैसे वो समझ चुके थे
की मुझको अब धरती पर ही रहना है
उसी वक़्त ऊपर से गुजरा वो उड़न खटोला
कल की मजलिस वाले उसमें से तकते थे
देख इधर का शोर-ओ-गुल
कुछ हतप्रभ से वो लगते थे
कोई कौतुहल में था, कोई विस्मित था
क्या सचमुच वो सही जगह है, ये सोच कोई तो चिंतित था
कोई आँखें चुराता जाता था, कोई हाथ हिलाता जाता था
और इन सब के बीच खड़ा में जैसे
फिर से विस्मित रह जाता था
ओर कुछ तो फिर खुद से बुदबुदाता था
लेकिन इतना हो चूका था शोर-ओ-गुल
अब उसे सुनने में वक़्त नहीं मैं गंवाता था

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