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September 23, 2012

किसी नयी चीज़ के आगमन पर
पुरानी का धीरे से पीछे हो जाना
स्वाभाविक बदलाव है
चीज़ों का यूँ ही सरकते जाना
और उनके पीछे हाथ कुछ न आना
असामयिक है
यूँ ही कभी पूछ बैठता हूँ खुद से
सोने से जरा पहले, उठने के ज़रा बाद
की कौन हूँ? क्यूँ हूँ? कहाँ जा रहा हूँ मैं?
किसी लम्बी नींद में हूँ
और नींद में ही चल रहा हूँ,
या जागा हूँ और जानता नहीं हूँ?
इतना सोया हूँ की जागने की आदत नहीं है?
कोई जवाब नहीं होता
धीरे से सहलाने वाला कोई हाथ नहीं होता
एक बुलबुला उठता है यूँ ही हवा में
जैसे वो अपने संग ले जा रहा हो मेरा कुछ
मेरे अंदर से उठता भाव उसमें तैरता हुआ
पीछे छोड़ जाता केवल कोई सवाल
जिसको सोचता रह जाता हूँ मैं
देखता जाते हुए उस बुलबुले को
विलुप्त होते एक अँधेरे के बीच
और फिर उठ के बैठ जाता हूँ
थोड़ी दूर चलकर कुछ टहलकर
फिर से कहीं किसी दिवार से सटकर
बैठ जाता हूँ कुछ थककर
और तब आ लगता है
कहीं दूर अनंत से निकला वो बल्लम
हो जाता है मेरी छाती में पैबस्त
उबल पड़ता है उसमें बहता लहू
कुछ स्याह रंग निकलता है
फिर धीरे धीरे सब वैसा ही जैसा मालूम है
वोही लाल खून, वोही रक्त का फूट फूट कर निकलना
उसको जानने की चाहत में मेरे हाथों का सन जाना
उन सने हाथों से चेहरे की शिकन मिटाना
जाकर खड़े हो जाना आईने के सामने
और पूछना
फिर से वोही सवाल
की कौन हूँ? क्यूँ हूँ? कहाँ जा रहा हूँ मैं?

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