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September 20, 2012

दिन यूँ जा रहे हैं जैसे हाथों के बीच से फिसलता पानी
रह जाता है गीलापन, एक हिलता कम्पित करता खालीपन
जैसे ओढ़ बैठा हो कोई ठण्ड में मखमली कम्बल
कुछ तो है जो अब भी अटक जाता है
उंगलियों के बीच कोनों में सिमटा हुआ, मद्धिम से लटका हुआ
खुद में सिकुड़ा हुआ, सिमटा हुआ, दबाये हुए एक अहसास
मैं देखूंगा इसे तो सूख जायेगा, मुरझा जायेगा
खुद को खुद में ही समाये हुए फिसल जायेगा,जुदा होजायेगा
गिरते हुए खुद को लुटा बैठेगा, मेरा भी कुछ चुरा ले जायेगा
जो मैं ना देखूंगा तो तो जो हो सकता है वो कभी हो ना पायेगा
कुछ तो है जो बैठा है खुद को करके बंद एक कोठरी में
एक पुरानी काली कोठरी में
वैसी ही जैसी थी कोठरी नानी की
जिसमें रखती थी बंद वो सामान
सामान जो आ सकते थे बस चंद लोगों के काम
एक सर टूटा हुआ कबूतर, एक ऊँघता हुआ बिस्तर
एक बड़ा सा भुलाया जा चुका इस्टील का बक्सा
जिसकी चादर पे पड़ गए थे कितने गड्ढे
उभर आये थे कितने कोने इसके
खोलना होता था उसको सम्हाल के
बंद थे उसके अन्दर उसकी परतों के दरमियाँ
सामान जो थे बस चंद लोगों के काम के
पुरानी चांदी की वरक लगी साड़ियाँ, कई और छोटे चूड़ी कसे बक्से
जिनमें बंद थे सामान जो थे हर एक के काम के
पर वो किसी को मिल ना पाते थे
क्यूंकि वो उस तक पहुँच ना पाते थे
कुछ वैसा ही बक्सा बन गया हूँ मैं
कुछ वैसी ही कोठरी हो गया हूँ मैं
ताले लगे हुए हैं जिसपे
खिड़कियाँ भी कसी हुयी हैं अन्दर से
दस्तक देनी होगी, कई बार देनी होगी
कुछ मिट्टी भी होगी अन्दर, कुछ पुरानी गंध भी होगी
खिड़की खोलनी होगी, बक्से झाड़ने होंगे
जो भी काम की चीज़ है सब निकालनी होगी
पर अब मन नहीं होता
पहले दम घुटता था अन्दर, अब वो वहम नहीं होता
कभी जब रात को सब सो जाते हैं
अँधेरा होता है, जुगनू टिमटिमाते हैं
तब खोल के खिड़की वो बाहर झांकता है
छोड़ आया है जिनको पीछे उनको निहारता है
कभी किसी की आँखें उसको ढूंढ़ लेती है
जान लेती हैं क्या है उस खिड़की के पीछे
जो बंद रहती है, बड़ी खामोश रहती है
क्रिकेट की गेंद उस पर दिन भर पड़ती है
पर वो कभी कुछ ना कहती है
जान लेती हैं वो उसके पीछे क्या चीज़ रहती है
खिड़की फिर बंद हो जाती है, चिटखनी चढ़ जाती है
उन आँखों से जगी सुगबुगाहट कुछ देर संग रह जाती है
धीरे से गिर वो खामोश पड़ी बिजली की तरह, उठाती है पुराना फटा हुआ कम्बल
खुद को लपेट के उसमें फिर सुकड़ जाती है अपने पसंदीदा कोने में
बक्से और दीवार के बीच सिमट कर ऐसे बैठ जाती है
जैसे कमरे में कोई हो जिससे छुपना है, जिसकी नज़रों से बचना है
सर दिवार से टकराकर, हाथों में कम्बल के सिरे दबाकर
वो फिर से उन आँखों का दीदार करती है
और उसको लगता है जैसे कोई दस्तक हुयी दरवाज़े पे
जैसे कोई टटोलता है दरवाज़े के पास कुण्डी ढूंढ़ता हुआ
वो और दुबक कर बैठ जाता है, सर कम्बल में छुपा लेता है
जैसे कोई आने वाला है कमरे में, उसे बचना है उसकी निगाहों से
यूँ व्यर्थ ही वो खुद को छुपाता है बचाता है
कुछ देर में बाहर फिर से सन्नाटा छा जाता है
नींद जा चुकी होती है, सुबह हुयी नहीं होती
दिन में सोने वालों से अक्सर रात बसर नहीं होती
उसको वो होने लगती है जो बरसों से ना हुयी थी
जिसकी आदत पड़ चुकी थी वो घुटन फिर से होने लगती है
इस बार वो कसी हुयी होती है, उसकी उंगलियाँ गर्दन दबा रही होती है
खड़ा होकर वो, कम्बल गिराकर, दौड़ पड़ता है खिड़की की तरफ
खोलकर उसको लम्बी सांस लेकर बाहर देखता है
दूर तक सड़क पर, आसमान पे, झाड़ियों के पीछे
देखता है, हर चीज़ ठीक से सुनता है टटोलता है
चंद डूबते तारे चंद भटकते कदम
एक लम्बा खाली पड़ा गलियारा, एक सुनसान दालान
हर तरफ बस एक ही मंजर हर चीज़ है वीरान
उसे फिर सुनाई देतीं हैं वो आवाजें जिनसे वो बहरा हो गया था
जिनको सुनने की तलाश में अब उसका खुद पे पहरा हो गया था
उसे फिर फिर लगता है कोई है कोई है
कोई है जो दरवाज़ा ढूंढता है, कुण्डी खटखटाता है
कोई है जो उसका नाम जानता है, उसका पता पता लगता है
कोई है जो उसकी तलाश में है
कोई है जिसकी मंजिल उसके कमरे के आस पास में है
कोई है जिससे मिलना है उसको
कोई है जिसको बहुत कुछ कहना है उसको
कोई है कोई है कोई है
इस कोई कोई में उसे लगता है लगने की वो खुद नहीं है
खड़ा हो जाता है बीच कमरे के सुनता आवाजों को
तभी जैसे एक चादर गिर पड़ी हो अपनी खूंटी से और पसर गयी वो जमीन पर
एक सन्नाटा सा हर दिवार हर कोने हर ओर उभर आता है
और वो बैठ पड़ता है जहाँ वो खड़ा था
शरीर शिथिल हो एक और लुढ़क जाता है
और धीरे से आके नींद उसको भर लेती है आगोश में
रोती आँखों से अपनी, थपथपाती माथा एक पुराना गीत गाती है
वो सो जाता है, वो खो जाती है
और जिनको वो मिलना चाहता था उनका दिन हो जाता है

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