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September 17, 2012

चले जाओ की दिल तुम्हारी याद में उदास आज भी है
ऐसा लगता है इसे किसी अन्होने की आस आज भी है
तुझे रूबरू करके ये कैसा होने का अहसास उभर आता है
लगता है मेरे होने में शामिल तेरा न होना आज भी है
इतने करीने से मैंने तोड़ा है इसे की पुरानी तस्वीर बन नहीं सकती
कोई भी अक्स कोई शख्सियत अब इसमें उभर नहीं सकती
क्यूँ ये लगता है की कोई आकर इसके टुकड़े बटोर सकता है
यूँ दूर खड़े मुझको अपने हाथों से छू सकता है
उसके हाथों की सख्त खाल पे सुख चुके वो गहरे घावों के निशाँ
मैं जो पकडे बैठा हूँ वो उसको जनता है, मुझको बता सकता है
कह सकता है की जाने दो, हाथ खोल दो, रक्त बह जाने दो
की मैं हूँ, हौसला रखो और इसको गुजर जाने दो
जिस को थामे बैठे हो अब वो दर्द उभर आने दो
बहुत कुछ गुजर चूका है, अब हम पे गुजरी है ये अहसास भी जाने दो
जाने दो निशानियों को, रोती बिलखती कहानियों को
हाथों पे सूख के खिंच आएँगी कुछ आड़ी तिरछी रेखाएं
इनसे मालूम हो उठेगा तुम कौन हो इनको रह जाने दो
देखकर पंडित हाथों मैं किस्मत की रेखाएं कहते हैं कहाँ जाने वाले हो
इन काली सख्त रेखाओं में अपना अतीत सिमट आने दो

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