दबा लाया हूँ मुट्ठी में कुछ
देखो तो इसे क्या है
मुट्ठी बंद है आज फिर मेरी
देखो तो क्या लाया हूँ मैं
झोले में मेरे पास जो था
वो लेकर बैठ गया
हर आने वाले को देता गया इक मुट्ठी झोले से
उसने जो दिया लेके रख लिया झोले में
देखो तो उन्होंने क्या दिया
इक खाली डब्बा, टूटी हुयी चप्पल
वो लुढ़कती हुयी बोतल
यही चुरा लाया हूँ
बचा कर ले आया हूँ
छुपा के ले आया हूँ
घर में घुसा हूँ इन्हें लेकर
सब सामान अब भी वैसा ही पड़ा है
जैसा छोड़ कर गया था
पीछे से है कोई आया नहीं
कोई कहीं गया नहीं
कोई मेरे पीछे था ही नहीं
वो खाली डब्बा
मैंने उलट पलट कर देखा
जैसे उसमें था कभी काम का कोई सामान नहीं
जैसे उसे अपने वज़न पे है कोई गुमान नहीं
जैसे उसे ये याद नहीं वो क्यूँ बना था
उसे कुछ पता नहीं वो क्यूँ तुला था
वो बाज़ार, वो हाट वो दुकानें
जिनमें वो कभी रोशन था
अब वो जैसे कहीं हैं ही नहीं
जैसे वो कभी थी ही नहीं
बस वो यूँ ही था हमेशा
इक खाली डब्बा, बेकार सा, बेढब सा
जिसमें रख लिया करते हैं लोग कोई भी सामान
कुछ भी काम का उसमें अमाता नहीं
वो किसी के भी ठीक काम आता नहीं
वो दे देते हैं उसे जो भी उसे ले जाता है
वो भी चला जाता है जहाँ भी उसे ले जाते हैं
रख देते हैं उसे जहाँ वहीँ पड़ा रहता है
रख देते हैं उसमें जो भी वो ले लेता है
कभी कोई कीमती चीज़ जैसे घड़ी
कभी खाने का कोई तेल लगा सामान
उसे मालूम है उसकी कीमत रखे हुए सामान से नहीं
उसे मालूम है उसकी बोली अब नहीं लगेगी
उसे मालूम है वो बिक चुका है, वो चुक चुका है
लुढका दी बोतल मैंने जमीं पर
कुछ देर खनकती इक आवाज़ के बाद
बंद हो, खामोश हो बैठ गयी है कोने में बिस्तर के नीचे
कितनी जल्दी समझ गयी है ये यहाँ के रिवाज़
ऐसे लगता है जैसे देने वाला इसे यहाँ से ही चुरा ले गया था
जैसे अपने ही घर की कोई चीज़ वापस आ गयी हो
जैसे इसके बिना कोई कमी सी थी
जैसे इसके होने से वो कमी और बढ़ गयी
टूटी चप्पल को नीचे रखकर मैंने डाल दिए उसमें अपने पैर
थोड़ी बड़ी है, पाँव छोटे हैं, अंगूठे और उँगलियों के दबाव से
इसकी आँखें निकल आई है, घिस चुकी है, उधड़ रही है
धीरे से सरका दिया इसे मैंने बिस्तर के बाजू में
कल मोची के ले जाऊंगा, टांका लगवा दूंगा
देखो कुछ मेरी ही तरह इसके भी टुकड़े निकल रहे हैं
कुछ कीलें लग जाएँगी, दुरुस्त हो जाएगी
कुछ दूर और चल जाएगी
मुझे भी तो जाना है इक मोची के पास
अपनी मरम्मत करवाने, तुरपन लगवाने
दिवार पे एकटक कुछ देर युहीं देखा
पड़े हर सामान पर फिर से नज़र गयी
ये भी आये थे यूँ हीं किसी रोज़
और जबसे आये हैं यहीं के होके रह गए
बाहर की दुनिया में इनका कोई ख़ास मोल नहीं
मेरे पास भी इनका कुछ ख़ास काम नहीं
रख पाता हूँ मैं इनका कुछ ख़ास ख्याल नहीं
पर इनके होने से यूँ लगता है कुछ है
कुछ है जो अभी अटका हुआ है
कुछ है जो अभी रवां है, अभी चल रहा है
कुछ है जिसे अभी दुरुस्त नहीं करना
कुछ है जिसे मोची के पास नहीं ले जाना
और यूँ ही सोचते आँख लग गयी
जाना होगा इक रोज़ मोची के पास
पर अभी वक़्त है, शायद अभी वक़्त है

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