Archive for July 2nd, 2012

July 2, 2012

वो जो बैठ मेरे अन्दर मुझसे बातें करता है
मुझे मसरूफ रखता है ज़माने से जुदा रखता है
हर पल मुझसे कहता है मुझे खुद से बाहर कब लाओगे?
ज़माने से कब मिलूँगा मैं? कब मेरी भी पहचान होगी?
चीख कर लेता हूँ जब भी उसका नाम
हो नाराज़ वो कहता है खामोश हो जाओ
ऐसे भी कोई बात करता है? वो कहता है
चिल्लाने से कहीं कोई सुनता है? वो कहता है
बड़ा नाज़ुक मिजाज़ हूँ मैं
मेरा नाम सरगोशियों में लिया करो,
मेरे बारे में यूँ ही न कहा करो कुछ
ज़िक्र मेरा दूसरों की खामोशियों से किया करो
तेरे चिल्लाने से मैं रगड़ उठता हूँ
मेरी खाल पे उभर आते है चकत्ते लाल
और ऐसे नहीं जाती इनकी जलन
कई शाम मैं डूबा रहता हूँ
कुछ ठहरी बुझी सी बातों में
मेरी फफ्की हुयी खाल उभड़ती है
फिर हलके से बैठ जाती है

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कुछ है जो छूट रहा है
कुछ है जो हाथ नहीं आता
कुछ है जिसने बेचैनी दी है
कुछ है जो नज़र नहीं आता

ऐसा लगता है आगे जाकर
ये सड़क कहीं खो गयी है
ये सड़क जिसपर मैं खड़ा हूँ
ये सड़क जो भटक गयी है

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कुछ इतना गुमसुम है माहौल
कि सुन सकता हूँ मैं अपनी ही दास्ताँ
कि लोग चीख रहे हैं इसमें,
कुछ सुनाई नहीं देता

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बड़ी भागदौड़ मची हुयी है
बड़ी तंग ये भगदड़ है
मेरे लिए ही होती है ये
इसमें मैं ही भागता हूँ

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July 2, 2012

मैं शायर नहीं हूँ पर
शायरी करनी पड़ती है
ये मेरी ज़िन्दगी नहीं है
पर जीनी पड़ती है

जैसे दातुन रगड़ के तुम
दांत माँज लेते हो
शब्दों को उगल के मैं
दिमाग साफ़ रखता हूँ

आम हो या ख़ास हो
दर्द सबको होता है
कोई मुंह ढक रो लेता है
कोई शब्दों में धो लेता है

मैं वो नहीं जिसने गुजरते देखा
मैं वो हूँ जिसपे गुजरी है
कभी पूरा एक नोट था
अब खुदरा सिक्का हूँ

यूँ ही रो पड़ा मैं
आसुओं में तर हुआ
जब सोचने बैठा तो
जान न पाया किसके लिए

वजह कोई एक नहीं है
काफी कुछ बेवजह है
जो हुआ कुछ उसके लिए
जो न हुआ कुछ उसके भी लिए

आसुओं का काम बह निकलना है
हमारा कारण ढूँढना है
कुछ उनके नाम जो न मिले
कुछ उनके जिनके निशाँ बचे