अभी हलकी नींद में था
तकिये को सीने से लगाये
खुद से, ‘थोडा और सो ले’ कह रहा था
क्रिकेट खेलने के लिए आऊँगा
ऐसा कह रखा था, करना बाकी था
दिन गरमी का था, मौसम बेसर्द था
दिन किसी का भी हो, रात अपनी होती है
कई दिन हो गए थे, ठीक से सोये हुए
ऐसा लगता था कभी सो भी न पाउँगा
आज सो पा रहा था
एक अच्छी नींद से भी अच्छी कोई चीज़ है?
कुछ ख्याल आ आ कर तंग कर रहे थे
मुझे पता नहीं है शायद
पर अब भी मेरे घर में
चुपके से कोई रहता है
ऐसा वो मुझसे कह रहे थे
मैं लिखने को उठना न चाहता था
ये मेरे अलफ़ाज़ नहीं हैं
इनमें मेरे अहसास नहीं है
कल रात गुलज़ार साब को चख लिया था
कभी कभी समझ आते थे
ज्यादातर ऊपर से निकल जाते थे
ये उनके स्वाद का आफ्टर अफेक्ट है
ऐसा मैं खुद से कह रहा था
क्रिकेट खेलने वाले वापस आ चुके थे
लाइट जला दी उन्होंने
अन्दर आने वाला जिसे मैं नहीं जनता था
एक जानने वाले का हमशकल था
वो शायद मेरे चहरे पे उड़ रहे भावों को खूब जनता था
मैं वो नहीं जो आप सोच रहे हो
मैं उसका जुड़वा भाई हूँ, वो बाहर है
वो सचमुच एक जैसे थे
मैं लिखने बैठ गया
और चारा भी क्या था
और लिखते लिखते मैंने जाना
की सचमुच, मेरे घर में
बहुत से लोग रहते हैं
मुझे उनसे मिलना नहीं है
उन्हें मिल के कुछ करना नहीं है
लेकिन वो रहते हैं
मेरे आस पास
कभी ख्यालों में
कभी दरवाज़े के जरा पीछे
हलके से कुण्डी खटखटाते हुए
वो मुझे बुलाते हैं
नींद से जागते हैं
मुझे जगाकर
अनमना सा पाकर
बड़ी जोर से खिलखिलाते हैं
जब दरवाज़ा खोल मैं बाहर जाता हूँ
तो वो शोर मचारे घर से निकल जाते हैं
मैं उनको जाता देखता रहता हूँ
फ्रिज का पानी पीते खुद से कहता हूँ
आज दिन में बाहर चलूँगा में
कहीं न कहीं किसी न किसी मीटिंग में
इनमें से किसी से जरुर मिलूँगा में
मिल कर इनसे क्या कहूँगा मैं?
ये सोचने को फिर से लेट जाता हूँ मैं

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: