पर्चियाँ…

शाम एक पिघलती हुयी सी है
और फिजा भी तो महकती हुयी सी है
पर क्या तुमने देखा, वो जा चुका है
देखो उस सड़क पर, हाँ वोही तो है
कुछ सामान भी है उसके साथ
अरे वो उसका वोही पुराना है बस्ता
कल ही तो कोई कह रहा था
हाँ कल ही तो कोई कह रहा था
चाय पीते पीते कोई कह रहा था
रोटी का कौर तोड़ते हुए कोई कह रहा था
और तो और देखो एक शख्स सुन रहा था
हाँ वो सबके सामने कह रहा था
कह रहा था कि उसके पास है बस वोही एक चीज़
वो, उसका पागलपन और उसका हमसफ़र बस्ता
हाँ ये सच है, सच ही तो कह रहा था वो
मैं पागल हूँ शायद दीवाना भी
मैं वो हूँ जिसका कोई अफसाना नहीं
गाता रहता हूँ मैं कोई भी गीत
पर आता नहीं मुझे ठीक से गुनगुनाना भी
यूँ ही घूमता रहता हूँ मैं
पर सच कहूँ, मैं बंजारा नहीं
तुमने मेरे साथ किसी को न देखा होगा
पर मैं इतना भी बेसहारा नहीं
एक डोलची थी मेरे पास
ले जिसे मैं बाज़ार निकला था
हाँ, ऐसी ही तो कुछ शाम थी वो
कुछ पिघलती हुयी सी, कुछ महकती हुयी सी
जब मैं ले उसे बाज़ार निकला था
क्या था उस डोलची में?
कुछ ख़ास नहीं
काम आने वाला कोई सामान नहीं
कुछ गुमनाम बदनाम पर्चियां थीं
जिनपर लिख रखा था
मैंने हर हाल तमाम
सफ़र की थकान थी उनमें
ह्रदय की उड़ान थी उनमें
समय की पहचान थी उनमें
बस यूँ समझ लो
चीज़ें तमाम थी उनमें
ऐसी ही तो वो शाम थी
जब मैं ले उसे निकला था
और वो उड़ चलीं
मेरे देखते देखते
मेरे हाथों में छोड़ डोलची
उड़ चली वो पर्चियां
अपने अंजाम को
खुले आसमान को
शहर एक बदनाम को
रख डोलची नीचे
मैं चल पड़ा उन उड़ती बिखरती
पर्चियों के पीछे
कुछ हाथ लगी कुछ छूट गयी
जाने कैसा पत्थरों का शहर था वो
उन पर गिर वो मासूम, वो नन्हीं कली सी
वो अधखिली सी,
वो पर्चियाँ भी उन पर गिर के टूट गयीं
मैं बैठा रहा उनके किनारे
हाँ, बड़ी देर मैं बैठा रहा
सच कहता हूँ तुमसे
बड़ी देर मैं बैठा रहा
झूठ क्यूँ बोलूँगा मैं
छोड़ो तुम नहीं समझोगे
तुम कहोगे मुझे कुछ चाहिए
सो कहानी गढ़ता हूँ
तुम समझोगे मैं काहिल हूँ
सो कुछ पाने तुम्हारा मन पसीजता हूँ
इसीलिए तो,
इसीलिए तो मैं यूँ ही चला जाता हूँ
लेकिन मैं बंजारा नहीं हूँ
मेरे साथ कोई नहीं है शायद
लेकिन मैं बेसहारा नहीं हूँ
मैं ढूँढता हूँ उन पर्चियों को
उन मासूम नन्ही कलियों को
और उन्हीं की धुन में
मैं यूँ ही चला जाता हूँ
तुम्हें मिले कोई पर्ची
तो सम्हाल रख लेना
जैसे मैं रखने लगा हूँ
वो बिखरी हुयी पर्चियां
मेरी न सही तो क्या
किसी की तो हैं
लिखा कुछ भी हुआ हो उनमें
प्यार से कही हुयी तो हैं
रो पड़ता हूँ उनको देख कर
याद में अपनी पर्चियों के
उन मासूम नन्ही कलियों के
कुचल डाला उन्हें यूँ ही
इन हवस के पुजारियों ने
इन अधनंगे बाजारियों ने
बेमोल थी वो, अनमोल थी वो
पर दाम लगा ही डाला
उनका इन कन्जड़ीयों ने
क्या कहूँ मैं औरों से
मेरी ही दुनियादारियों ने
पर भूलती नहीं हैं वो
छूटती नहीं है वो
कितना भी खुरच लूँ खुद को
निकलती नहीं हैं वो
किस से कहूँगा मैं
क्या क्या कहूँगा मैं
क्या था लिखा मैंने
मेरी उन पर्चियों में
शायद युहीं सहूंगा मैं
सोचता यही रहूँगा मैं
क्या लिखा था मैंने
मेरी उन पर्चियों में
क्यों लिखा था मैंने कुछ
क्यूँ याद न रखा
क्यूँ ध्यान न रखा
क्यूँ खुद को सावधान न रखा
कोई तो ढूंढ के लाओ
लाकर मुझे दिखाओ
कुछ भी नहीं है रोने लायक
कुछ भी नहीं था लिखने लायक
कुछ था ही नहीं होने लायक
मेरी उन पर्चियों में
वो थीं मेरा वहम
वो मेरा गुमान थीं
कुछ भी नहीं थी वो
बस खेलने का सामान थी
क्या कहेगा ये जमाना
कैसे समझेगा ये जमाना
जब भूल चुके हैं जग में सारे
क्या क्या लिखा था उन्होंने
अपनी अपनी पर्चियों में
बेबस उन अर्जियों में
घुटने वाली सर्दियों में
कम्बल के भीतर छुपकर
कैसे खेलों का जहाँ बनाकर
जहाँ को खेल बनायेंगे
ऐसा लिखा था उन पर्चियों में
बेबस उन अर्जियों में

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