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February 23, 2012

ज़िन्दगी जो हो न सकी…

ज़िन्दगी जो हो न सकी
बदनाम हो न सकी
नाम कर न सकी
किये थे खुद से जो वादे
जो काम वो कर न सकी
ज़िन्दगी जो हो न सकी
नाम उस ज़िन्दगी के हैं
हाथों के धूल के गुब्बारे
चाहत वाले रंग सारे
चमकते सितारे टूटते तारे
फुर्सत के मेरे पल सारे
नाम उस ज़िन्दगी के हैं
ज़िन्दगी जो हो न सकी
बदनाम हो न सकी
नाम कर न सकी
किये थे खुद से जो वादे
जो काम वो कर न सकी
नाम उस ज़िन्दगी के हैं

फूलों के बगीचे में
आँगन के नीचे में
धूप में छाँव में
नींद में अंगड़ाव में
सफ़र के हर पड़ाव में
छुप के वो रहती है
अहिस्ता सी चलती है
शरमाई सी लजाई सी
छू लूँ तो घबराई सी
पलकों के नीचे अश्रु छुपाये
सपनों सी गुजरती है
मुझे खुद से जुदा रखती है
ज़िन्दगी जो हो न सकी
बदनाम हो न सकी
नाम कर न सकी
किये थे खुद से जो वादे
जो काम वो कर न सकी

बाज़ार चला जाता हूँ
किसी हंसी में खो जाता हूँ
किसी की बातों में आ जाता हूँ
युहीं कुछ देर कहीं ठहर जाता हूँ
जब भी मैं उससे दूर चला जाता हूँ
मुझे बहुत तड़पाती है
ढूंढे से भी मिल न पाती है
सताती है छुप जाती है
मुझे बहुत रुलाती है
फिर मैं सो जाता हूँ
उठ कर मायूस हो जाता हूँ
उसके बिना रह न पाता हूँ
फिर जाता हूँ उन्हीं मकानों में
राहों में आरामगाहों में
ढूँढता हूँ उसे भूलता हूँ खुद को
लेकिन नहीं पा पता हूँ
बेबस सा भरमाता हूँ
शायद चली गयी है मुझे छोड़
ये सोच खुश हो जाता हूँ
पकड़ तकिये को हाथ से
सो जाता हूँ,
नूतन स्वप्न सजाता हूँ
पर सपनों में भी कोई आकर
कोई कहता है बारम्बार
ये कैसे होगा?
जब वो न हुआ तो फिर
ये कैसे होगा?
घबराकर उठ जाता हूँ
और पाता हूँ सिरहाने उसको
थपकी देते सर को मेरे
ज़िन्दगी जो हो न सकी
बदनाम हो न सकी
नाम कर न सकी
किये थे खुद से जो वादे
जो काम वो कर न सकी

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