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February 21, 2012

हर दिन…

हर दिन एक ख्वाब है
हर दिन एक मंजिल
हर दिन एक मुकाम है
हर रस्ता एक महफ़िल

निकला था सरेफोश से
राह पर सफ़र पर
पकड़े थे कई लोग यूँ
कुछ राही कुछ हमसफ़र

कुछ छूट गए कुछ साथ रहे
कुछ रूठ गए कुछ बात कहे
मैं सबमें रहा सब मुझमें रहे
हम सब किसी नींदी में रहे

कभी मुड़ता हूँ कुछ पढ़ता हूँ
कुछ देखता हूँ कुछ सोचता हूँ
फिर यूँ ही चल पड़ता हूँ
अगली मंजिल पर सोता हूँ

सोते सोते ये ख़याल आया
वो जो मुझसे छूट गए
वो जो मुझसे रूठ गए
वो भी कहीं सोते होंगे

क्या वोभी यूँही सोते होंगे?
उनके भी गुप्त ख्यालों में
मेरे ख्याल तैरते होंगे?
मैंने उनको शुभरात्री कहा
शायद उन्होंने भी कह दिया होगा
मैं नीम रात फिर सोया रहा
वो भी कहीं सो गया होगा

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