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January 29, 2012

परिंदे …

नयी उड़ानों के परिंदे
दूर तक उड़ जाते हैं
देख कर आसमाँ की दूरियाँ
छूने को क्षितिज मचल जाते हैं

नहीं जानते वो हवाओं का रुख क्या है
नहीं मानते वो औरों को हुआ क्या है
पर हैं मेरे और मैं उड़ना जानता हूँ
जानकर ये सोचते हैं और जानना क्या है

हवाएं रुख मोड़ देती हैं
हौसले तोड़ देती है
लूट कर परों की बिजलियाँ
बरसते पानी सा गिरता छोड़ देती हैं

आसमाँ में जगह नहीं मिलती
ज़मीं पे रह नहीं पाते
दर्द से चीखते हैं चिल्लाते हैं
छटपटाते हैं भटक जाते हैं
टूट कर हार कर थक कर मन मार कर
रोज़ की उहापोह से घबराकर
अपना एक घोंसला बनाते हैं

ताकते हैं पंछियों को
वो खुले सुर के बेसुरों को
कूदते हैं फुदकते हैं
नए पर फड़फड़ाते हैं
अपने ही मन की गांठों में उलझ
कोने में दुबके रह जाते हैं

फिर सुबह के संग पुरवा आती है
बतलाती है समझाती है
राज़ ये उनके सर कर जाती है
परिंदे वो नहीं होते जो उड़ना सीख जाते हैं
परिंदे आसमाँ को अपना घर बनाते हैं

चल तू भी अब उड़ जा
सब जाते हैं तू न रह जा
क्षितिज भी है और हवा भी है
तुझको तो अब सब पता भी है
तू उड़ता नहीं क्यूंकि बस तू ही उड़ सकता है
तू उड़ता है क्यूंकि तू बस उड़ ही सकता है

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