सुपर कमांडो

 

खाना खाने के बाद छेदी की ताकत मनो बढ़ सी गयी थी. आखिर वो भी पहले दर्जे का सुपर कमांडो था. अगर बैज़नाथ को अलग कर दिया जाये तो शायद ही कोई उसका मुकाबला कर सकता था. “बैजनाथ का भी बस किस्मत का खेल है. अगर शाका उसकी जगह मुझे मिला होता तो आज मैं बैजनाथ से बेहतर होता,” छेदी बडबडाया. उसकी नाराज़गी बेवजह नहीं थी. बैजनाथ स्कूल मैं नया आया था. छेदी वहां का पुराना चैम्पियन था. फिर चाहे बात फ्ल्यिंग किक मारने की हो या पाइप  के रास्ते स्कूल की बिल्डिंग पर चढ़ने की, छेदी सबसे अव्वल था. अभी पिछले ही साल जब बिजली का तार पकड़ने की शर्त लगी थी, तब भी तो वो नहीं घबराया था. हॉस्टल की एक मंजिला इमारत से कूदकर उसे सामने से जाती बिजली की तार छूनी थी. ‘हवा में लटकते हुए तार छूने से कर्रेंट नहीं लगता,’ ऐसा हॉस्टल के उभरते हुए वैज्ञानिकों का मानना था और छेदी इसे सिद्ध करना चाहता था. उसके इस कारनामे ने कुछ तो सिद्ध किया ही था, भले ही इसके लिए उसे बिजली का तेज़ झटका सहना पड़ा, जिसने कई दिनों के लिए शर्म से उसकी नज़रों को जमीन से उठने नहीं दिया था. यह देखकर हॉस्टल के मनो-वैज्ञानिकों ने एक रास्ता निकला जिसके तहत उस रात कई लोग उसके कमरे के बाहर जमा हो गए और आपस मैं यह चर्चा करने लगे की हो न हो, छेदी जैसा बहादुर कोई नहीं. 

“भाई ऐसा कुछ करने के लिए कलेजा चाहिए, जो मेरे अंदर तो नहीं है भाई” उनमें से एक बोला.

“सही बात है. मैं तो कहता हूँ छेदी पहले नंबर का कमांडो है.” दूसरे ने जोड़ा.

“मेरा भी यही मानना है. मेरे हिसाब से वो ही हमारे स्कूल और हॉस्टल का सबसे उत्तम सुपर कमांडो है” तीसरे ने तुकारी लगायी. 

कमरे के अंदर से सोने का नाटक कर रहे छेदी की मानों बांछे खुल गयी थीं. कुछ देर बाद वो ऐसे निकला जैसे उसने कुछ सुना ही ना हो. सभों की ओर देखते हुए मुस्कराया, ओर वे सब भी मुस्करा दिए. छेदी ने समझा उसकी बहादुरी की क़द्र करते हुए मुस्कराए हैं. वो उसकी नासमझ हरकतों पर खुश हो रहे थे ओर सोच रहे थे अगला धमाका कब होगा. 

लेकिन अब हालात बदल गए थे. बैजनाथ दूसरे स्कूल से आया था ओर बड़ी ही रफ़्तार के साथ बहादुरी ओर सुपर कमांडो दल मैं उसने ऊंची पदवी हासिल कर ली थी. उसकी फ्ल्यिंग किक अजय देवगन जैसी है, ऐसा लोग कहने लगे थे. छेदी मैं फुर्ती तो है पर बैजनाथ में ताकत भी है.

“मियाँ एक लात लग जाये तो समझे मुंह नहीं सीधा होने का कई रोज़ तक.”

“मैं कहता हूँ ऐसी नौबत ही क्यूँ आने दिया जाये. बैजनाथ से तो दोस्ती बनाये रखने मैं ही भलाई है.”

“हाँ. ओर वो नेकदिल भी तो कितना है. अभी पिछले हफ्ते एक कबूतर को चोट लग गयी थी. उसने उसका इलाज़ किया ओर अब अपने ही कमरे मैं रखा हुआ है. ओर क्या बात मनाता है वो उसकी. उर कर उसकी उंगली पर बैठ जाता है. मैं कहता हूँ वो छेदी से बेहतर कमांडो बन चूका है.” 

छेदी को मानों काटो खून नहीं. उसकी सरजमीं पर किसी ओर ने आकर अधिपत्य जमा लिया था ओर वो बेबस सा देख रहा था? कभी नहीं. आज वो खाना खाकर जल्दी आ गया था और बैजनाथ के कमरे के बहार खड़ा था. एक जोर की लात के साथ दरवाज़ा खुल चूका था. अंदर मैदान साफ़ था. बाकी सभी लोग अभी भी खाना खाने में व्यस्त थे. छेदी की निगाहें शाका पर जा टिकीं. वो अपनी खिरकी पर फुदुक रहा था. चप्पल उतार कर छेदी बिस्तर पर चढ़ गया ओर शाका को अपने हाथों मैं ले लिया. थोरा पुचकारने के बाद वो उसकी भी उंगली पर ऐसे बैठ गया मानों उसी का कबूतर हो. एक मधुर और कुटिल मुस्कान छेदी के चहरे पर आ टिकी. अब उसे लोगों के आने का इंतज़ार करना था, ताकि अपने नए करतब का प्रदर्शन कर के वह खोयी हुयी सुपर कमांडो की पदवी हासिल कर सके. 

इसमें कितनी देर लगनी थी. तमाशा अच्छा हो तो तमाशबीन आप ही जुट जाते हैं. थोरी ही देर में संभु, राजू और मनीष सब जमा हो चुके थे. छेदी कमरे के बीच में खरा शान से मुस्कुरा रहा था. माज़रा कुछ समझ में न आ रहा था. लेकिन जो भी था कुछ अच्चा ही होने वाला था. छेदी फिर से बिस्तर पर जा चढ़ा और अपना हाथ हवा में फैला दिया. पंखा बंद कर दिया गया था जिससे की शाका को कोई चोट न पहुँच सके. एक छोटी सी सीटी के साथ ही शाका उर और उर कर उस के हाथ की उंगली पर जा बैठा. ठीक वैसे ही जैसे कुली मैं अमिताभ बच्चन के कंधे पर बाज़ जा बैठता था. फिर क्या था. तालियाँ बजने लग पारी. इतने में बैजनाथ वहां आ पहुंचा. नज़ारा देखकर उसे मसला समझते देर न लगी. छेदी के सामने खरा होकर उसने बोला, “छेदी भाई मान गए. आखिर ये तुमने कर ही दिखाया. मुझे तो पहले से ही पता था.” बैजनाथ ने शाका की ओर देखा मानों इशारों ही इशारों में शिकायत करता हो. कुछ नाराज़गी सी भी थी. शाका को अपने पर दया करने वाले की आँखों में बेरुखी कुछ कम भाई. उसने अपनी पाकर छेदी की उंगली पर बढ़ाई और देखते ही देखते उसके नाख़ून छेदी की उंगली के आर पार थे. खून बह चला था. आखिर हर जुंग की तरह सुपर कमांडो की जुंग में भी खून तो बहाना ही पड़ता है.

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